

मेरी वसीयत
….मेरा सफर जो कभी रुका नहीं- झुका नहीं, न जाने कब अपनी मंजिल प्राप्त कर ले और जीवन की संध्या छा जाये। मेरा जीवन एक भिखारी का जीवन रहा है। मेरे देश के विशेष रूप से इस प्रदेश के लोगों ने मुझे अपार स्नेह और सम्मान दिया है, और मेरी झोली को अपने स्नेह दान से भरा है। उन सभी देशवासियों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु मैंने दो संस्थाओं ‘भारत सेवा संस्थान’ और ‘मोतीलाल मेमोरियल सोसाइटी को जन्म दिया तथा अपने जीवन के आदर्शों और मूल्यों को उनमें निहित करने का प्रयास किया है। यह दोनों संस्थायें मेरी कल्पना के अनुरूप उत्तरोत्तर विकसित होती रहें और देश की गरीब जनता की सेवा करते हुए विद्यार्थी तथा युवा वर्ग को सही दिशा देकर उनका पथ प्रशस्त श्श्करती रहें, यही मेरी अभिलाषा है। इन संस्थाओं के माध्यम से मैं अपने विचारों और स्वप्नों को साकार करने में कहाँ तक सफल रहा हूँ यह आने वाला समय ही बतायेगा। मेरी जीवन लीला समाप्त होने के पश्चात् भी उक्त दोनों संस्थायें, जिनमें मैंने समाज सेवा के उद्देश्यों और आदर्शों को संजोकर रखा है. ईमानदारी से अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहें यही मेरी इच्छा है।
राजनीति के क्षेत्र में कार्यरत होते हुए भी समाज सेवा के व्रत को निरन्तर निभाने के लिए मैं प्रयत्नशील रहा हूँ और अंतिम क्षणों तक रहूँगा। मैं देश का हूँ और देश मेरा है, मेरा सर्वस्य देश पर ही न्यौछावर हो। मैं अपने सभी देशवासियों एवं सहयोगियों के प्रति आभार प्रकट करता हूँ जिन्होंने संघर्षों के क्षणों में पग-पग पर मेरा साथ दिया है, विश्वास दिया है।
जो कुछ भी मेरा अपना कहने योग्य था वह सब ‘भारत सेवा संस्थान’ एवं मोतीलाल मेमोरियल सोसाइटी’ का हो चुका है। अब केवल एक मकान ‘सेवा कुटीर’, स्थित पानदरीबा, शहर लखनऊ मेरी निजी अचल सम्पत्ति के रूप में रह गया है, जिसका मैं एकमात्र स्वामी हूँ। जीवनपर्यन्त उक्त मकान का स्वामित्व मुझमें रहेगा और उसके पश्चात् सम्पूर्ण मकान की मिल्कियत भारत सेवा संस्थान, लखनऊ में हस्तांतरित हो जायेगी।…
दिनांक 3 फरवरी, 1980
(चन्द्र भानु गुप्त)
पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश

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